बदलते समय ने पढ़ाई के साथ हमारी सोच भी बदल दी है

समय के साथ कितना बदलाव सही है

समय के साथ कितना बदलाव सही है

पहले की पढ़ाई और आजकल की पढ़ाई में बहुत फ़र्क आ गया है। हमने तो पढ़ाई का तनाव पेन का पिछला हिस्सा चबा चबाकर मिटाया था। पुस्तक के बीच विद्या की पत्ती और मोरपंख रखने से हम होशियार हो जाएंगे ऐसा हमारा पक्का विश्वास हुआ करता था। हर साल जब नई कक्षा के बस्ते लेते तब कॉपी किताबों पर कवर चढ़ाना हमारे जीवन का वार्षिक उत्सव बोले तो आज का ऐनुअल फंक्शन था। हमारे माता पिता को हमारी पढ़ाई की आज जितनी फ़िक्र नहीं थी। न ही हमारी पढ़ाई उनकी जेब पर कभी बोझ बनती थी। सालों साल बीत जाते थे पर माता-पिता के कदम हमारे स्कूल में नहीं पड़ते थे।

हमने पैदल चलते चलते न जाने कितने रास्ते नाप दिए होंगे। यह अब याद भी नहीं। हाँ बस कुछ धुंधली सी यादें हैं। स्कूल में पिटते हुए और मुर्गा बनते हमारा ईगो हर्ट नहीं होता था। क्योंकि तब हम जानते ही नही थे कि ईगो होता क्या है? हम दुनिया में कहीं भी हों लेकिन यह सच है कि हमें हकीकतों ने पाला है। हम सच की दुनियां में जीते थे। आज जैसी दिखावटी-बनावटी दुनिया से हम कोसों दूर थे।

आज जहां रिश्तों में फॉर्मेलिटी बढ़ गई वहीं एक वक्त हमारा था। हमें तो ये फॉर्मेलिटी करना कभी आया ही नहीं। इस मामले में हम हमेशा मूर्ख ही रहे। अपने अच्छे बुरे कर्मों को झेलते हुए हम आज भी भविष्य के ख्वाब बुन रहे हैं।शायद ख्वाब बुनना ही हमें जिन्दा रखे है।जो जीवन हम जीकर आये हैं उसके सामने आज का जीवन तो कुछ भी नहीं।आज घर बड़े होते जा रहे हैं पर उनमें रहने वाले लोग कम होते जा रहे हैं। सब अपनी-अपनी अलग दुनिया बसाने में लगे हैं। भावनाएं ख़त्म हो रही हैं। आज वो पुराने दिन बहुत याद आते हैं। अच्छे थे या बुरे थे पर हम सब एक साथ थे। वो भी क्या दिन थे।

जब हम छोटे हुआ करते थे, तब गर्मियों की छुट्टियों में अक्सर नानी के घर जाना हमारी पहली पसंद हुआ करती थी। तब महीने-महीने वहीं कब बीत जाते थे पता ही नही चलता था। ना ही वहां से वापस लौटने का मन करता था। इतना प्यार जो मिलता था वहां सबसे। पर अब...

अब हम बड़े हो गये हैं, गर्मियों की छुट्टियाँ अभी भी होती हैं, जो छोटे हैं वो जाते अब भी हैं नानी मामा के घर। जाकर जल्दी लौट भी आते हैं। पहले सा लगाव जो ख़तम होता जा रहा है। बस यही कुछ बदला है तब में और अब में। क्यों बदला है? इसका सही कारण किसी को नही पता है।

समय इतना बदल जायेगा, किसी ने सोचा भी न होगा। लोग अपने में इतना व्यस्त हो जायेंगे कि उनके पास औरों के लिए समय तक नही होगा। किसने सोचा था?मॉडर्न होने की सोच रखते-रखते आज हम क्या से क्या हो गये। अभी और न जाने क्या-क्या होना बाकी है। दोष किसका है? कहीं आज की शिक्षा पद्धति का तो नहीं? समय मिले तो जरा विचार कीजियेगा।

बाकी इसे पढ़ते वक्त कोई पुरानी याद ताज़ा हो गई हो तो हमें नीचे कॉमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें। पूरा लेख पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद।

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